Chintan Quotes

युग निर्माण योजना


जब समुद्र मथा गया था तो उसमें से सबसे पहले विष, फिर वारुणी, उसके बाद अन्य रत्न निकले थे। युग निर्माण के लिए, मूर्छित समाज को जाग्रत करने के लिए भी गायत्री संस्था द्वारा वह अमृत निकालने के लिए समुद्र- मंथन का कार्य हो रहा है, जिसे पीने से यहाँ के निवासी इस देवभूमि को अमरों, भूसुरों की निवास- स्थली प्रत्यक्ष रूप में दिखा सकें।
यह समुद्र- मंथन ठीक प्रकार से चल रहा है या नहीं, इसकी प्रारम्भिक परीक्षा यही...View More
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समाज निर्माण


युग निर्माण परिवार के हर सदस्य को युग परिवर्तन की प्रक्रिया को एक धर्म युद्ध मानकर चलने के लिए कहा गया है। पाप और अनाचार से, दुष्टता और असुरता से लड़ना इस आपत्तिकाल में हर प्रबुद्ध एवं भावनाशील व्यक्ति के लिए अनिवार्य हो गया है। अज्ञान असुर से प्रचारात्मक मोर्चे पर और अनाचार दानव से संघर्ष मोर्चे पर लड़ा जाएगा, तभी हर मस्तिष्क पर अधिकार किये हुए आज के हिरण्याक्ष लोभी दृष्टिकोण का अंत किया जा सकेगा।
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युग निर्माण योजना


युग निर्माण परिवार के हर सदस्य को युग परिवर्तन की प्रक्रिया को एक धर्म युद्ध मानकर चलने के लिए कहा गया है। पाप और अनाचार से, दुष्टता और असुरता से लड़ना इस आपत्तिकाल में हर प्रबुद्ध एवं भावनाशील व्यक्ति के लिए अनिवार्य हो गया है। अज्ञान असुर से प्रचारात्मक मोर्चे पर और अनाचार दानव से संघर्ष मोर्चे पर लड़ा जाएगा, तभी हर मस्तिष्क पर अधिकार किये हुए आज के हिरण्याक्ष लोभी दृष्टिकोण का अंत किया जा सकेगा।
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शांतिकुंज -21 वीं सदी की गंगोत्री


आज मनुष्य को जीना कहाँ आता है? जीना भी एक कला है। सब आदमी खाते हैं, पीते हैं, सोते हैं और मौत के मुँह में चले जाते हैं, किन्तु जीना नहीं जानते। जीना बड़ी शानदार चीज है। इसको संजीवनी विद्या कहते हैं- जीवन जीने की कला। यहाँ हम अपने विश्वविद्यालय में, शांतिकुंज में जीवन जीने की कला सिखाते हैं और यह सिखाते हैं कि आज के गए- बीते जमाने में आप अपनी नाव पार करने के साथ- साथ सैकड़ों आदमियों...View More
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समाज निर्माण


आज मनुष्य को जीना कहाँ आता है? जीना भी एक कला है। सब आदमी खाते हैं, पीते हैं, सोते हैं और मौत के मुँह में चले जाते हैं, किन्तु जीना नहीं जानते। जीना बड़ी शानदार चीज है। इसको संजीवनी विद्या कहते हैं- जीवन जीने की कला। यहाँ हम अपने विश्वविद्यालय में, शांतिकुंज में जीवन जीने की कला सिखाते हैं और यह सिखाते हैं कि आज के गए- बीते जमाने में आप अपनी नाव पार करने के साथ- साथ सैकड़ों आदमियों...View More
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युग निर्माण योजना


आज मनुष्य को जीना कहाँ आता है? जीना भी एक कला है। सब आदमी खाते हैं, पीते हैं, सोते हैं और मौत के मुँह में चले जाते हैं, किन्तु जीना नहीं जानते। जीना बड़ी शानदार चीज है। इसको संजीवनी विद्या कहते हैं- जीवन जीने की कला। यहाँ हम अपने विश्वविद्यालय में, शांतिकुंज में जीवन जीने की कला सिखाते हैं और यह सिखाते हैं कि आज के गए- बीते जमाने में आप अपनी नाव पार करने के साथ- साथ सैकड़ों आदमियों...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


हमारी तपश्चर्या का प्रधान प्रयोजन उन सुसंस्कारित आत्माओं में प्राण और साहस भरना है, जिनकी मनोभूमि में आज के युगधर्म को समझ सकने और उसके लिए कुछ करने की हिम्मत विद्यमान है। हमारे तप से इस स्तर के व्यक्ति पूरी तरह लाभान्वित होंगे। पिछले दिनों रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण, अरविन्द घोष जैसे महामानवों ने इसी स्तर की, इसी प्रयोजन की तप- साधना की थी और उसका फल भारतीय स्वतन्त्रता के लिए उत्पन्न अगणित शूर सैनिकों के रूप में प्रस्तुत हुआ।...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


हमारे प्रेमी- परिजन लोभ- मोह के जाल से जिस हद तक निकल सकें, निकलने के लिए पूरा जोर लगाएँ। भौतिक और व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं की कीचड़ से निकलकर विश्व- मानव की आराधना के लिए त्याग- बलिदान भरा अनुदान अधिक से अधिक मात्रा में उत्पन्न करें।
पश्चिम का भोगवाद जिस अग्नि में- तेजाबी तालाब में जलता- कलपता, निष्ठुर स्वार्थपरता की कीचड़ में डूबा विकल, संत्रस्त दृष्टिगोचर हो रहा है, उसे भारतीय अध्यात्म ही भावसंवेदना की गंगोत्री में स्नान कराके मुक्ति दिलाएगा। इक्कीसवीं...View More
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प्रेरक विचार


बीज छोटा सा होता है,परन्तु फलों का, फूलों का, सभी का गुण छोटे से बीज में सन्निहित होता है। छोटे से शुक्राणु में बाप, दादा का पीढ़ियों का गुण समाया रहता है। इसी तरह जो भी इस संसार का दिव्य ज्ञान- विज्ञान है, वह इस छोटे से गायत्री मंत्र के अन्दर समाविष्ट है। २४ अक्षरों वाले बीज में विद्यमान है।
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प्रेरक विचार


निर्माण परिवार के हर व्यक्ति को अपने बारे में ऐसी ही मान्यता बनानी चाहिए कि हमको भगवान ने विशेष काम के लिए भेजा है। यह कोई विशेष समय है और हममें से हर आदमी को यह अनुभव करना चाहिए कि हम कोई विशेष उत्तरदायित्व लेकर के आए हैं। समय को बदलने का उत्तरदायित्व, युग की आवश्यकताओं को पूरा करने का उत्तरदायित्व हमारे कन्धों पर है। अगर इन बातों पर आप विश्वास कर सकें तो आपकी प्रगति का दौर खुल सकता...View More
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युग निर्माण योजना


निर्माण परिवार के हर व्यक्ति को अपने बारे में ऐसी ही मान्यता बनानी चाहिए कि हमको भगवान ने विशेष काम के लिए भेजा है। यह कोई विशेष समय है और हममें से हर आदमी को यह अनुभव करना चाहिए कि हम कोई विशेष उत्तरदायित्व लेकर के आए हैं। समय को बदलने का उत्तरदायित्व, युग की आवश्यकताओं को पूरा करने का उत्तरदायित्व हमारे कन्धों पर है। अगर इन बातों पर आप विश्वास कर सकें तो आपकी प्रगति का दौर खुल सकता...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


एक साधक अपनी श्रद्धा के बल पर धातु और पत्थर से बनी प्रतिमाओं से चमत्कारी प्रतिक्रिया उत्पन्न कर लेता है, दूसरा अपनी अनास्था के कारण जीवन्त देव मानवों के अति समीप रहने पर भी कोई लाभ नहीं ले पाता। एकलव्य ने मिट्टी से बनी द्रोणाचार्य प्रतिमा से वह अनुदान प्राप्त कर लिया था जो पाण्डव सचमुच के द्रोणाचार्य से भी प्राप्त नहीं कर सके थे। मीरा के ‘गिरधर गोपाल’ और राम कृष्ण परमहंस की ‘काली’ में जो चमत्कारी शक्ति थी...View More
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भारतीय संस्कृति


एकलव्य ने भी अध्यात्म का व्यापार किया था और मिट्टी के द्रोणाचार्य से इतना सीख लिया कि कुत्ते का मुँह तक सिल दिया था। अर्जुन जो पहले कायर बना हुआ था,परन्तु भगवान श्रीकृष्ण के समझाने पर जब उसने भी अपने अन्दर आत्मबल धारण किया तो वह फायदे में रहा। भगवान आगे- आगे थे तथा उसके सारथी बनकर चल रहे थे।
बेटे,आत्मबल एक सुन्दर तथा नफे का व्यापार है। हम भी इसके व्यापारी हैं। हमारा आपसे निवेदन है कि आप भी...View More
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प्रेरक विचार


एकलव्य ने भी अध्यात्म का व्यापार किया था और मिट्टी के द्रोणाचार्य से इतना सीख लिया कि कुत्ते का मुँह तक सिल दिया था। अर्जुन जो पहले कायर बना हुआ था,परन्तु भगवान श्रीकृष्ण के समझाने पर जब उसने भी अपने अन्दर आत्मबल धारण किया तो वह फायदे में रहा। भगवान आगे- आगे थे तथा उसके सारथी बनकर चल रहे थे।
बेटे,आत्मबल एक सुन्दर तथा नफे का व्यापार है। हम भी इसके व्यापारी हैं। हमारा आपसे निवेदन है कि आप भी...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


सार्थक उपासना के मर्म
उपासना में मन स्वाभाविक रूप से लगे तथा अंतरंग क्षमताओं के संयोग से साधक उसका अधिक लाभ उठा सके, इसके लिये कुछ नियम हैं। तीन महत्त्व पूर्ण नियमों का उल्लेख यहाँ किया जाता है। प्रथम उपासना की सुनिश्चित मात्रा। उपासना अन्तःकरण का आहार, उसके व्यायाम जैसी है। व्यायाम अथवा आहार का क्रम कभी अधिक कभी कम रहे तो उसका ठीक ठाक लाभ नहीं मिल सकता है। अपनी शक्ति एवं रुचि के अनुसार न्यूनतम मात्रा निश्चित करके...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


हमें अपना सारा साहस समेटकर तृष्णा और वासना के कीचड़ से बाहर निकलना होगा और वाचालता और विडम्बना से नहीं, अपने कृत्यों से अपनी उत्कृष्टता का प्रमाण देना होगा। हमारा उदाहरण ही दूसरे अनेक लोगों को अनुकरण का साहस प्रदान करेगा।
वाणी और लेखनी के माध्यम से लोगों को किसी बात की, अध्यात्मवाद की भी जानकारी कराई जा सकती है। इससे अधिक भाषणों का कोई उपयोग नहीं। दूसरों को यदि कुछ सिखाना हो, तो उसका एक मात्र तरीका अपना उदाहरण...View More
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धर्म और विज्ञान


वासना- तृष्णा की कीचड़ से निकालकर हमें परिजनों को महानता के पथ पर अग्रसर और ईश्वरीय इच्छा की पूर्ति के लिए नियोजित करना है। जिन्हें हम प्यार करते हैं, उन्हें सहज छोड़ने वाले नहीं हैं। वे अनुभव करेंगे कि कोई अदृश्य सत्ता उन्हें ऊपर उठने और आगे बढ़ने के लिए कहती- सुनती ही नहीं, नोचती- झकझोरती भी है। हमें चैन से जीवन भर बैठने नहीं दिया गया। चैन और आराम की बात, दौलत और अमीरी की बात को अपने आदर्शवादी...View More
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मानवीय गरिमा


मन कुचाल छोड़, इन्द्रिय लिप्साओं में भटकना छोड़। वासना आग की तरह है, भोग उपभोग से यह शान्त होने वाली नहीं है। इन्हें तृप्त करने के जितने ही साधन जुटायेगा उतनी ही अतृप्ति भड़केगी। फिर उनके कुचक्र में जितना ही फँसा जाय उतनी ही क्षमता, आयु, प्रतिभा घटती है। क्षणिक चटोरेपन के पीछे समर्थता की सम्पत्ति को गँवाने और दिन- दिन दुर्बल होते जाने से क्या लाभ? बता मन, तू कोयलों के ऊपर मुहरें निछावर करने में क्या बुद्धिमत्ता अनुभव...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


पुरुषार्थ के दो पक्ष हैं- एक श्रम और दूसरा मनोयोग। श्रम में स्फूर्ति और तत्परता होनी चाहिए। मनोयोग में तन्मयता, निष्ठा का समावेश होना चाहिए। अन्यथा इन दोनों का स्तर नहीं बनता और चिह्न पूजा होने जैसी स्थिति बनी रहती है। लकीर पीटते रहने को पुरुषार्थ नहीं बेगार भुगतना कहा जाता है। उसका प्रतिफल भी नहीं के बराबर ही होता है। साधना के क्षेत्र में भी उच्चस्तरीय पुरुषार्थ चाहिए। साधक की उपासना में सघन श्रद्धा और जीवन प्रक्रिया में उत्कृष्टता...View More
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स्वस्थ जीवन


जो स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जागरूक नहीं है, उसे देर या सबेर बीमारियाँ आ दबोचेंगी। जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद,मत्सर सरीखे मानसिक शत्रुओं की गतिविधियों की तरफ से आँखें बन्द किये रहता है, वह कुविचारों और कुकर्मों के गर्त में गिरे बिना नहीं रहेगा। जो दुनिया के छल, प्रपंच, झूठ, ठगी, लूट, अन्याय, स्वार्थपरता, शैतानी आदि की ओर से सावधान नहीं रहता, उसे उल्लू बनाने वाले, ठगने वाले, सताने वाले अनेकों पैदा हो जाते हैं। जो जागरूक नहीं...View More
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सफल सार्थक जीवन


जिस प्रकार कर्तव्यशील पुलिस, न्यायाधीश अथवा राजा को सामने खड़ा देखकर कोई पक्का चोर भी चोरी करने या कानून तोड़ने का साहस नहीं कर सकता। इसी प्रकार जिस व्यक्ति के मन में यह भावना दृढ़तापूर्वक समाई हुई है कि परमात्मा सर्वत्र व्याप्त है और हजार आँखों से उसके हर विचार और कार्य को देख रहा है तो उसकी यह हिम्मत नहीं हो सकती कि कोई पाप गुप्त या प्रकट रूप से करे।
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भाव संवेदना


जिस प्रकार कर्तव्यशील पुलिस, न्यायाधीश अथवा राजा को सामने खड़ा देखकर कोई पक्का चोर भी चोरी करने या कानून तोड़ने का साहस नहीं कर सकता। इसी प्रकार जिस व्यक्ति के मन में यह भावना दृढ़तापूर्वक समाई हुई है कि परमात्मा सर्वत्र व्याप्त है और हजार आँखों से उसके हर विचार और कार्य को देख रहा है तो उसकी यह हिम्मत नहीं हो सकती कि कोई पाप गुप्त या प्रकट रूप से करे।
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


उपासना की निष्ठा को जीवन में हमने उसी तरीके से घोलकर रखा है जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के प्रति निष्ठावान रहती है और कहती है- ‘सपनेहु आन पुरुष जग नाही।’ आपके पूजा की चौकी पर तो कितने बैठे हुए हैं। ऐसी निष्ठा होती है कोई? एक से श्रद्धा नहीं बनेगी क्या? मित्रो! हमारे भीतर श्रद्धा है। हमने एक पल्ला पकड़ लिया है और सारे जीवन भर उसी का पल्ला पकड़े रहेंगे। हमारा प्रियतम कितना अच्छा है। उससे अधिक...View More
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समाज निर्माण


व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में संव्याप्त अगणित दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध व्यापक परिमाण में संघर्ष आरम्भ किया जाये। इसलिए हर नागरिक को अनाचार के विरुद्ध आरम्भ किये धर्म युद्ध में भाग लेने के लिए आह्वान करना होगा। किसी समय तलवार चलाने वाले और सिर काटने में अग्रणी लोगों को योद्धा कहा जाता था, अब माप दण्ड बदल गया। चारों ओर संव्याप्त आतंक और अनाचार के विरुद्ध संघर्ष में जो जितना साहस दिखा सके और चोट खा सके उसे उतना बड़ा...View More
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युग निर्माण योजना


व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में संव्याप्त अगणित दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध व्यापक परिमाण में संघर्ष आरम्भ किया जाये। इसलिए हर नागरिक को अनाचार के विरुद्ध आरम्भ किये धर्म युद्ध में भाग लेने के लिए आह्वान करना होगा। किसी समय तलवार चलाने वाले और सिर काटने में अग्रणी लोगों को योद्धा कहा जाता था, अब माप दण्ड बदल गया। चारों ओर संव्याप्त आतंक और अनाचार के विरुद्ध संघर्ष में जो जितना साहस दिखा सके और चोट खा सके उसे उतना बड़ा...View More
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मानवीय गरिमा


मानव जीवन को स्रष्टा का सर्वोत्तम उपहार कहा गया है। इस निर्माण में परमात्मा ने अपना सारा कला- कौशल सँजो दिया है। प्राणियों में इसके समकक्ष और कोई नहीं है। उसे विशिष्ट काया,मन, बुद्धि, प्रतिभा सुविधा सभी कुछ उपलब्ध है। विकास क्रम में भी वह समस्त जीवधारियों से आगे है। इतना सब कुछ होने पर भी अभी मनुष्य का विकास अधूरा रह गया है। उसके पास जो बुद्धि- वैभव है, वह जीवन को सुव्यवस्थित रखने, चेतना के उच्चतम स्थिति तक...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


महात्मा बुद्ध का कथन है कि अन्तःकरण भी एक मुख है। दर्पण में हम अपना मुख देखते हैं तथा सौन्दर्य देखकर प्रमुदित होते हैं। हमारे मुँह पर यदि धब्बे या कालौंच आदि होती है तो उसे भी सप्रयास छुटाने की चेष्टा करते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इस अन्तःकरण रूपी मुख को भी हम नित्यप्रति चेतना के दर्पण में देखें- परखें और उसके सौन्दर्य में अभिवृद्धि करें। आत्मनिरीक्षण करके देखें कि किन- किन कषाय कल्मषों ने आत्मा के...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


मंत्रों की शक्ति, भगवान की शक्ति, उपासना की शक्ति के बारे में जिसमें एक चीज जुड़ी ही रहनी चाहिए; उसका नाम है- चरित्र। दुश्चरित्र आदमी, दुष्ट आदमी, दुराचारी आदमी यह ख्याल करे कि हम यह मंत्र जप करके, माला घुमा करके, पूजा करके किसी देवी- देवता को प्रसन्न करके काबू में ला सकते हैं तो यह बिल्कुल असम्भव है। मेरी जिंदगी का सार यही है चरित्र वाला पक्ष, जिसमें मैंने अपने आपको धोबी के तरीके से धोया और धुनिये के...View More
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मानवीय गरिमा


आज प्रबुद्ध लोगों की स्थिति भी यह है कि वे लम्बी चौड़ी योजनाएँ बनाने, वाद- विवाद एवं आलोचना करने में तो बहुत सिर खपाते हैं, पर रचनात्मक कार्य करने के लिए जब समय आता है तो बगलें झाँकते हैं, दाँत निपोरते हैं...View More
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भाव संवेदना


आज प्रबुद्ध लोगों की स्थिति भी यह है कि वे लम्बी चौड़ी योजनाएँ बनाने, वाद- विवाद एवं आलोचना करने में तो बहुत सिर खपाते हैं, पर रचनात्मक कार्य करने के लिए जब समय आता है तो बगलें झाँकते हैं, दाँत निपोरते हैं...View More
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