Chintan Quotes

आध्यात्मिक चिंतन धारा


उपासना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है- क्यों ?
     उपासना का अर्थ होता है- पास बैठना। परमात्मा के पास बैठने से ही ईश्वर उपासना हो सकती है। साधारण वस्तुएँ तथा प्राणी अपनी विशेषताओं की छाप दूसरों पर छोड़ते हैं तो परमात्मा के...View More
Pandit Shriram Sharma Acharya
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


आप अपनी उपासना को प्राणवान बनाइए। प्राण किसे कहते हैं? प्राण उसे कहते हैं, जो अपना कलेवर साथ- साथ लिए घूमता- फिरता है। प्राण जो है, उसके भीतर इच्छाएँ रहती हैं, हिम्मत रहती है, बहादुरी रहती है कि वह दिमाग को घसीट ले जाए, शरीर...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


मानव जीवन को स्रष्टा का सर्वोत्तम उपहार कहा गया है। इस निर्माण में परमात्मा ने अपना सारा कला- कौशल सँजो दिया है। प्राणियों में इसके समकक्ष और कोई नहीं है। उसे विशिष्ट काया,मन, बुद्धि, प्रतिभा सुविधा सभी कुछ उपलब्ध है। विकास क्रम में...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


हम कौन हैं?
‘‘लोग हमें संत, सिद्ध, ज्ञानी मानते हैं। कोई लेखक, वक्ता, विद्वान और नेता समझते हैं, पर किसने हमारा अन्तःकरण खोलकर पढ़ा, समझा है? कोई उसे देख सका होता, तो उसे मानवीय व्यथा- वेदना की अनुभूतियों की करुण कराह से हाहाकार...View More
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भाव संवेदना


हम कौन हैं?
‘‘लोग हमें संत, सिद्ध, ज्ञानी मानते हैं। कोई लेखक, वक्ता, विद्वान और नेता समझते हैं, पर किसने हमारा अन्तःकरण खोलकर पढ़ा, समझा है? कोई उसे देख सका होता, तो उसे मानवीय व्यथा- वेदना की अनुभूतियों की करुण कराह से हाहाकार...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


हमारी उपासना एक है- समर्पण की, श्रद्धा की। हमने नाले की तरह से अपने आपको नदी के साथ में मिला दिया है और उसमें मिल जाने की वजह से हमारी हैसियत, हमारी औकात, हमारी शक्ति और हमारा स्वरूप नदी जैसा बन गया है।
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समाज निर्माण


हराम की कमाई खाने वाले,भ्रष्टाचारी बेईमान लोगों के विरुद्ध इतनी तीव्र प्रतिक्रिया उठानी होगी जिसके कारण उन्हें सड़क पर चलना और मुँह दिखाना कठिन हो जाये। जिधर से वे निकलें उधर से ही धिक्कार की आवाजें ही उन्हें सुननी पड़ें। समाज में उनका उठना- बैठना बन्द हो जाये और नाई, धोबी, दर्जी कोई उनके साथ किसी प्रकार का सहयोग करने के लिए तैयार न हों।
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


सिंह जब शिकार पर आक्रमण करता है, तो एक क्षण ठहरकर हमला करता है। धनुष पर बाण को चढ़ाकर जब छोड़ा जाता है तो यत्किंचित् रुककर तब बाण छोड़ा जाता है। बन्दूक का घोड़ा दबाने से पहले जरा- सी देर शरीर को साध कर स्थिर कर लिया जाता है, ताकि निशाना ठीक बैठे। इसी प्रकार अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति के लिये पर्याप्त मात्रा में आत्मिक बल एकत्रित करने के लिये कुछ समय आन्तरिक शक्तियों को फुलाया और विकसित किया जाता...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


आत्मदर्शन का अर्थ है अन्तःकरण में पवित्रता और प्रखरता का समुचित सम्वर्धन। दर्पण पर धूलि जमी हो या उसके भीतर का रंग उतर गया हो तो फिर उसमें मुख दीख पड़ने का सुयोग न बनेगा। जिसने अपने अंतःक्षेत्र को टटोला नहीं है, उसे धोया संजोया नहीं है, उसके लिये यह कठिन है कि उस गंदले क्षेत्र में ईश्वर का आगमन अवतरण या दिव्य- दर्शन की आशा करे। वस्तुतः आत्मशोधन ही प्रभुदर्शन का एक मात्र उपाय है।
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सफल सार्थक जीवन


अपना सुधार करो तो सम्पर्क में आने वाले दूसरे भी सुधर जाएँगें, जो अपने को नहीं सुधार सका उसका दूसरों के प्रति धर्मोपदेशक का अधिकार नहीं बनता।
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समाज निर्माण


अपना सुधार करो तो सम्पर्क में आने वाले दूसरे भी सुधर जाएँगें, जो अपने को नहीं सुधार सका उसका दूसरों के प्रति धर्मोपदेशक का अधिकार नहीं बनता।
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सफल सार्थक जीवन


मित्रो ! दुनिया की तीन मूर्खताएँ; उपहासास्पद होते हुए भी कितनी व्यापक हो गई हैं यह देखकर आश्चर्य होता हैः-
१ पहली यह कि लोग धन को शक्ति मानते हैं।
२ दूसरी यह कि लोग अपने को सुधारे बिना दूसरों को धर्मोपदेश देते हैं।
३ तीसरी यह कि कठोर श्रम से बचे रहकर भी लोग आरोग्य की आकाँक्षा करते हैं।
मनुष्य को चाहिए कि झूठ से कामना सिद्ध न करे। निन्दा, स्तुति तथा भय से भी झूठ न बोले और न लोभवश। चाहे...View More
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धर्म और विज्ञान


मित्रो ! दुनिया की तीन मूर्खताएँ; उपहासास्पद होते हुए भी कितनी व्यापक हो गई हैं यह देखकर आश्चर्य होता हैः-
१ पहली यह कि लोग धन को शक्ति मानते हैं।
२ दूसरी यह कि लोग अपने को सुधारे बिना दूसरों को धर्मोपदेश देते हैं।
३ तीसरी यह कि कठोर श्रम से बचे रहकर भी लोग आरोग्य की आकाँक्षा करते हैं।
मनुष्य को चाहिए कि झूठ से कामना सिद्ध न करे। निन्दा, स्तुति तथा भय से भी झूठ न बोले और न लोभवश। चाहे...View More
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मानवीय गरिमा


पराक्रमों में सबसे अधिक महत्त्व का वह है जिसमें अपनी अनगढ़ आदतों को सुधारने का श्रेय पाया जा सके। बाहरी संघर्षों से जूझने और कठिनाइयों को हटाने में दूसरे लोग भी सहायता कर सकते हैं और परिस्थितिवश श्रेय भी मिल सकता है। किंतु अनुपयुक्त आदतों को बदलना मात्र अपने निजी पुरुषार्थ के ऊपर ही रहता है इसलिए उसे प्रबल पराक्रम की संज्ञा दी गई है और उसे ऐसे लोगों को सच्चे अर्थों में शूरवीर कहा गया है।...View More
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