Chintan Quotes

कर्मफल और ईश्वर


मानवी साहसिकता और धर्मनिष्ठा का तकाजा है कि जहाँ भी अनीति पनपती देखें वहाँ उसके उन्मूलन का प्रयत्न करें। यह न सोचें कि जब अपने ऊपर सीधी विपत्ति आवेगी तब देखा जावेगा। आग अपने छप्पर में लगे तभी उसे बुझाया जाय,...View More
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मानवीय गरिमा


मतभेदों की दीवारें गिराये बिना एकता, आत्मीयता, समता, ममता जैसे आदर्शों की दिशा में बढ़ सकना संभव नहीं हो सकता। विचारों की एकता जितनी अधिक होगी स्नेह, सद्भाव एवं सहकार का क्षेत्र उतना ही विस्तृत होगा। परस्पर खींचतान में नष्ट होने वाली शक्ति...View More
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धर्म और विज्ञान


ईश्वर सर्वत्र है, इसका यह गलत अर्थ नहीं लगा लेना चाहिए कि जहाँ जो कुछ भी हो रहा है ईश्वर की इच्छा से हो रहा है। बुराइयाँ, बुरे काम, ईश्वर की इच्छा से कदापि नहीं होते। पाप कर्म तो मनुष्य अपनी स्वतंत्र कर्तृत्व...View More
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कर्मफल और ईश्वर


ईश्वर सर्वत्र है, इसका यह गलत अर्थ नहीं लगा लेना चाहिए कि जहाँ जो कुछ भी हो रहा है ईश्वर की इच्छा से हो रहा है। बुराइयाँ, बुरे काम, ईश्वर की इच्छा से कदापि नहीं होते। पाप कर्म तो मनुष्य अपनी स्वतंत्र कर्तृत्व...View More
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स्वाध्याय और सदविचार


प्रशंसा और यश के लिए अधिक उत्सुक न रहिए, क्योंकि यदि आप प्रतिभावान हैं, तो आपको बढ़ने से कोई भी आलोचना नहीं रोक सकेगी। दूसरे की आलोचना को आंतरिक सच्ची प्रेरणा के सम्मुख कोई महत्त्व न दीजिए, वरन् जितनी भी आलोचना हो...View More
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प्रेरक विचार


प्रशंसा और यश के लिए अधिक उत्सुक न रहिए, क्योंकि यदि आप प्रतिभावान हैं, तो आपको बढ़ने से कोई भी आलोचना नहीं रोक सकेगी। दूसरे की आलोचना को आंतरिक सच्ची प्रेरणा के सम्मुख कोई महत्त्व न दीजिए, वरन् जितनी भी आलोचना हो...View More
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कर्मफल और ईश्वर


प्रायश्चित का अर्थ है- स्वेच्छापूर्वक दण्ड भुगतना। इसके लिए तैयार हो जाने से यह सिद्ध होता है कि अपराधी को सच्ची सद्बुद्धि उपजी है, उसे वस्तुतः अपनी भूल पर दुःख है। जो किया है, उसका दण्ड बहादुरी से भुगतने की तैयारी है। ऐसा...View More
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भाव संवेदना


आत्म- विश्वास अनियंत्रित भावुकता का नाम नहीं है, वरन् उस दूरदर्शिता का नाम है, जिसके साथ संकल्प और साहस जुड़ा रहता है। ऐसे आत्म- विश्वासी जो भी काम करते हैं उसमें न तो ढील- पोल होती है, न उपेक्षा और न गैर जिम्मेदारी। वे...View More
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सफल सार्थक जीवन


आत्म- विश्वास, श्रम और साहस का प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के निर्माण में महत्त्वपूर्ण स्थान माना गया है, पर वह वास्तविकता पर आधारित होना चाहिए। नशेबाजों की तरह आवेशग्रस्त स्थिति में कुछ भी पाने और कुछ भी बनने के लिए आतुर सपने देखना व्यर्थ...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


आत्म- विश्वास बिना पंखों के आसमान पर उड़ने का नाम नहीं है। उसमें अपनी सामर्थ्य तौलनी पड़ती है, अनुभव, योग्यता और साधनों का मूल्यांकन करना पड़ता है और समीक्षापूर्वक इस नतीजे पर पहुँचना पड़ता है कि आज की स्थिति में किस...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


चापलूसों की प्रशंसा शत्रु की निन्दा से अधिक हानिकारक है। शत्रु निन्दा करके हमें हमारी त्रुटियों की याद दिलाते हैं और उन्हें सुधारने का प्रकारान्तर से प्रकाश देते हैं, जबकि खुश करने के फेर में पड़े हुए लोग जान या अनजान...View More
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स्वाध्याय और सदविचार


प्रगति, समृद्धि की पगडण्डी कोई नहीं, केवल एक ही राजमार्ग है कि अपने व्यक्तित्व को समग्र रूप से सुविकसित किया जाय। ‘धूर्तता से सफलता’ का भौंडा खेल सदा से असफल होता रहा है और जब तक ईश्वर की विधि- व्यवस्था...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


अंतरंग जितना ही निर्मल, निष्पाप होगा, अन्तर्द्वन्द्वों के कारण नष्ट होने वाली मेधा उसी परिमाण में बची रह सकेगी और उस निर्द्वन्द्व, निश्चिन्त मनःस्थिति में अनेकानेक प्रतिभाएँ उभरती रहेंगी। प्रसुप्त दिव्य क्षमताओं के जागरण का सुयोग बनेगा। यही है वह सार तत्त्व...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


पुरुषार्थ कभी निष्फल नहीं जाता। उससे जो क्रिया कुशलता बढ़ती है वह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। संसार के समस्त पुरुषार्थों में आत्म निर्माण की दिशा में किया गया प्रयास सर्वोपरि बुद्धिमत्ता का परिचायक है। उससे जीवन की जड़ें मजबूत...View More
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सफल सार्थक जीवन


यौवन कोई अवधि नहीं, वरन् एक मानसिक स्थिति है। उसकी परख रक्त के उभार के आधार पर नहीं, इच्छा, कल्पना एवं भावना के आधार पर ही की जानी चाहिए। आदमी तब तक जवान रहता है, जब तक उसमें उत्साह, साहस और निष्ठा बनी रहती...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


समझदारी का तकाजा है कि संसार चक्र के बदलते क्रम के अनुरूप अपनी मनःस्थिति को तैयार रखें। लाभ, सुख, सफलता, प्रगति, वैभव, पद आदि मिलने पर अहंकार से ऐंठने की जरूरत नहीं है। कहा नहीं जा सकता वह स्थिति कब तक रहेगी। स्थिति कभी...View More
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प्रेरक विचार


समझदारी का तकाजा है कि संसार चक्र के बदलते क्रम के अनुरूप अपनी मनःस्थिति को तैयार रखें। लाभ, सुख, सफलता, प्रगति, वैभव, पद आदि मिलने पर अहंकार से ऐंठने की जरूरत नहीं है। कहा नहीं जा सकता वह स्थिति कब तक रहेगी। स्थिति कभी...View More
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धर्म और विज्ञान


मनुष्य को चाहिए कि झूठ से कामना सिद्ध न करे। निन्दा, स्तुति तथा भय से भी झूठ न बोले और न लोभवश। चाहे राज्य भी मिलता हो तो झूठ, अधर्म को न अपनावे। भोजन- जीविका बिना भी चाहे प्राण जाते हों, तो भी...View More
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समाज निर्माण


जिसमें स्वार्थ परायण व्यक्ति अधिक हों, वह समाज जीवित नहीं रह सकता और न वह उन्नति और विकास की ओर अग्रसर हो सकता, क्योंकि केवल अपने स्वार्थ को महत्त्व देने वाले व्यक्ति अपने- अपने लाभ की, छीना- झपटी में परस्पर संघर्षरत रहेंगे। जहाँ...View More
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सफल सार्थक जीवन


अनीतिपूर्वक सफलता पाकर लोक- परलोक, आत्म- संतोष, चरित्र, धर्म तथा कर्तव्य निष्ठा का पतन कर लेने की अपेक्षा नीति की रक्षा करते हुए असफलता को शिरोधार्य कर लेना कहीं ऊँची बात है। अनीति मूलक सफलता अंत में पतन तथा शोक, संताप का ही...View More
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युग निर्माण योजना


अनीतिपूर्वक सफलता पाकर लोक- परलोक, आत्म- संतोष, चरित्र, धर्म तथा कर्तव्य निष्ठा का पतन कर लेने की अपेक्षा नीति की रक्षा करते हुए असफलता को शिरोधार्य कर लेना कहीं ऊँची बात है। अनीति मूलक सफलता अंत में पतन तथा शोक, संताप का ही...View More
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प्रेरक विचार


सत्य- असत्य का भेद करने के लिए मनोभूमि निष्पक्ष होनी चाहिए। उसमें किसी प्रकार के पूर्वाग्रह नहीं होने चाहिए। किसी मान्यता पर आग्रह जमा हो तो मनोभूमि पक्षपात ग्रसित हो जाएगी। तब अपनी ही बात को किसी न किसी प्रकार सिद्ध करने...View More
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सफल सार्थक जीवन


यदि मनुष्यता को जीवित रहना है तो उसे एकता और आत्मीयता की दिशा में बढ़ना होगा। मतभेदों की दीवारें गिरानी पड़ेंगी तथा चिंतन और कर्तृत्व की एकरूपता प्रस्तुत कर सकने वाला राजमार्ग बनाना पड़ेगा। जीवन और मरण के बीच और...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


यह सोचना व्यर्थ है कि पारमार्थिक जीवन में हानि अधिक है। सच तो यह है कि पाप- पंक में फँसे रहने पर पग- पग पर, पल- पल पर जो आत्म- प्रताड़ना तथा बाहरी व्यथा- बाधाएँ सहनी पड़ती हैं। उनकी तुलना में दिव्य जीवन में...View More
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सफल सार्थक जीवन


आदर्शवादी जीवन जीने का- महानता के प्रगति पथ पर चलने का हर किसी को अवसर मिल सकता है, यदि वासना, तृष्णा पर अंकुश रखा जाय और श्रेष्ठता अभिवर्धन की साध को जीवन्त, ज्योतिर्मय बनाया जाय। यह अति सरल है व कठिन भी। सरल...View More
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सुव्यवस्थित पारिवारिक संबंध


परिवार का संतुलन सही रखना हो तो मोह से बचते हुए कर्तव्य तक सीमित रहना होगा। परिवार के लोगों के प्रति असाधारण मोह ही उनका स्तर गिराने और अपने कर्तव्य च्युत होने का प्रधान कारण होता है। यदि परिजनों की...View More
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प्रेरक विचार


अहंकार पर आधारित विश्वास पतन का द्वार खोलता है। भौतिकता के वशीभूत व्यक्ति संकीर्णता, स्वार्थपरता एवं अनुदारता के दलदल में फँस जाते हैं। अहंकार का आधार ही मनोविकार एवं भौतिक पदार्थ है। भोग- लिप्सा के सिवाय उसे कुछ दिखलाई ही नहीं पड़ता। इसके...View More
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सफल सार्थक जीवन


जीवन के हर क्षेत्र में विश्वास की आवश्यकता है। विश्वास हमारा मार्गदर्शन करता है तथा सद्पथ पर चलने की प्रेरणा देता है। जीवन रहस्य को समझने के लिए आत्म- विश्वास का सहारा लेना ही पड़ेगा। जीवन निर्माण में आत्म- विश्वास का प्रधान...View More
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सफल सार्थक जीवन


जीवन निर्माण के लिए आत्म- निष्ठा पर आधारित आत्म- विश्वास की अभिवृद्धि आवश्यक है। इसका सहज मार्ग अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्वों को ईमानदारी के साथ पूर्ण करते चलने में है। कार्यों के छोटे- बड़े की चिन्ता नहीं होनी चाहिए। छोटे- छोटे कार्यों के...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


मनोजगत् के प्रति दुर्व्यवहार की एक विडम्बना द्वेष, दुर्भाव और दुश्चिन्ताओं के रूप में देखी जा सकती है। जो प्रगति कर रहा है, उन्नति के पथ पर आगे बढ़ रहा है, उससे डाह रखकर हम उसकी प्रगति तो नहीं रोक सकते, हाँ...View More
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