Chintan Quotes

आध्यात्मिक चिंतन धारा


जाति- पाँति के आधार पर किसी को हेय, हीन या छोटा समझना अध्यात्मवाद के सर्वथा विपरीत है। दुष्टता और सज्जनता के आधार पर किसी को नीच- ऊँच माना जाय, किसी कुकर्मी का तिरस्कार और श्रेष्ठ सत्पुरुष का सम्मान किया जाय यह बात दूसरी...View More
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हर मनुष्य में हर स्तर की क्षमता बीज रूप में विद्यमान है। प्रयत्नपूर्वक उन्हें जगाया और बढ़ाया जा सकता है। अधिक समय लगे और अधिक श्रम करना पड़े, यह बात दूसरी है, पर मंद गति कहे जाने वाले भी अध्यवसाय का सहारा...View More
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सफल सार्थक जीवन


पुरुषार्थ में विश्वास रखने वाले सच्चे कर्मवीर जीवन में कभी असफल अथवा परास्त नहीं होते। उनकी पराजय तो तब ही कही जा सकती है जब वे एक बार की असफलता से निराश होकर निष्क्रिय हो जायें और प्रयत्नों के प्रति उदासीन...View More
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स्वाध्याय और सदविचार


ईर्ष्या की उत्पत्ति दूसरों की उन्नति देखकर होती है और होती केवल उन्हीं व्यक्तियों को है, जो अक्षम, अदक्ष और अशक्त होते हैं। वे स्वयं तो कोई उन्नति करने योग्य होते नहीं और न अपनी मानसिक निर्बलता के कारण प्रयत्न ही...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


दैन्य न तो बाहरी साधनों और भौतिक संपत्ति की विपुलता से हटाया जा सकता है और न ही उसका रोना रोते रहने से। दारिद्रय घर में नहीं, मन में रहता है। विपुल संपत्ति रहते हुए भी धन लिप्सा के उचित- अनुचित का...View More
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प्रेरक विचार


अच्छे लोगों को असफल, दुःखी या कष्ट झेलते समय हमें तुरन्त यह फैसला नहीं दे देना चाहिए कि अच्छाई का जमाना नहीं रहा। सफलता, सुख, स्वास्थ्य और सम्पन्नता आदि उपलब्धियाँ एक वैज्ञानिक रीति से काम करते हुए ही अर्जित की जा सकती...View More
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सफल सार्थक जीवन


कठिनाइयाँ वास्तव में कागज के शेर के समान होती हैं। वे दूर से देखने पर बड़ी ही डरावनी लगती हैं। उस भ्रमजन्य डर के कारण ही मनुष्य उन्हें देखकर भाग पड़ता है, पर जो एक बार साहस कर उनको उठाने के...View More
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समय का सदुपयोग


विषय- वासनाएँ मनुष्य के अधःपतन का प्रबल हेतु हैं और उनका त्याग उन्नति की एक आवश्यक शर्त है। वासनाओं की संतुष्टि उनकी तृप्ति से नहीं, बल्कि त्याग से होती है, जिसका प्रतिपादन समय रहते तक ही किया जा सकता है, जब तक शरीर...View More
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सफल सार्थक जीवन


मनुष्य अपना शिल्पी आप है। वह स्वयं ही अपना निर्माण करता है। आत्म तत्त्व की रक्षा ही सर्वोत्कृष्ट निर्माण माना गया है। इस निर्माण के लिए मनुष्य को सत्य तथा वास्तविक नीति का अवलम्बन करना चाहिए। सत्य मानव जीवन की सफलता...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


मनुष्य अपना शिल्पी आप है। वह स्वयं ही अपना निर्माण करता है। आत्म तत्त्व की रक्षा ही सर्वोत्कृष्ट निर्माण माना गया है। इस निर्माण के लिए मनुष्य को सत्य तथा वास्तविक नीति का अवलम्बन करना चाहिए। सत्य मानव जीवन की सफलता...View More
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प्रेरक विचार


अहंकार एक विषैले सर्प की तरह अंतःकरण में ही छिपा बैठा रहता है और अवसर पाते ही आघात कर देता हे। इसके दंश से मनुष्य की सद्बुद्धि मूर्छित हो जाती है और तब वह न करने योग्य काम करता...View More
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धर्म और विज्ञान


धर्म की स्थापना में राजनीति का सहयोग आवश्यक है और राजनीति के मदोन्मत्त हाथी पर धर्म का अंकुश रहना चाहिए। दोनों एक दूसरे के विरोधी नहीं, वरन् पूरक हैं। दोनों में उपेक्षा या असहयोग की प्रवृत्ति नहीं, वरन् घनिष्ठता एवं परिपोषण का...View More
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प्रगति की आकांक्षा


व्यक्ति को क्षमता और प्रतिभा ईश्वर ने इस उद्देश्य से दी है कि अपने से पिछड़े हुए लोगों को कम से कम अपने स्तर तक ऊपर उठाने का प्रयत्न करे, परन्तु जिसने दौलत! दौलत!! दौलत!!! की रट लगा रखी...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


व्यक्ति को क्षमता और प्रतिभा ईश्वर ने इस उद्देश्य से दी है कि अपने से पिछड़े हुए लोगों को कम से कम अपने स्तर तक ऊपर उठाने का प्रयत्न करे, परन्तु जिसने दौलत! दौलत!! दौलत!!! की रट लगा रखी...View More
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हमें अपना दृष्टिकोण संघर्षमय न बनाकर रचनात्मक बनाना चाहिए। मनुष्य चाहे तो अपने स्वभाव को थोड़ा प्रयत्न करके आसानी से सुधार सकता है। दूसरों को दुर्बुद्धि, उजड्ड और विद्वेषी बताने की अपेक्षा अच्छा है कि आप स्वयं ही अपने आपको मिलनसार बनायें।...View More
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प्रेरक विचार


महत्त्वाकाँक्षी व्यक्ति अपने लिए विशेष लाभ भले ही प्राप्त कर लेते हों, पर जन- समाज के लिए वे संकट रूप ही बने रहते हैं। वित्तैषणा, पुत्रैषणा और लोकेषणा की तृष्णा, वासना की अहन्ता से क्षुब्ध हुए मनुष्य उन पागलों का रूप धारण...View More
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प्रायः अखबारों में नाम और फोटो छपाने के लोभ में कई लोग सत्कर्मों का बहाना करते रहते हैं। यश मिलने की शर्त पर ही थोड़ी उदारता दिखाने वाले लोग बहुत होते हैं, परन्तु दया, करुणा, त्याग और परमार्थ की भावनाओं को चरितार्थ...View More
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अपनी असलियत हम जितनी अच्छी तरह जान सकते हैं दूसरे उतनी नहीं। सो दोषों की निन्दा और उनके उन्मूलन की चेष्टा हमें अपने आप से आरंभ करनी चाहिए, क्योंकि अपने निकटतम समीपवर्ती हम स्वयं ही हैं। अपने ऊपर अपना जितना प्रभाव और...View More
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मनुष्य कुसंस्कारों का गुलाम हो जाय, अपने स्वभाव में परिवर्तन न कर सके, यह बात ठीक नहीं जँचती। यह मनुष्य के संकल्प बल और विचारों के दृष्टिकोण को समझकर कार्य करने पर निर्भर है। महर्षि वाल्मीकि, संत तुलसीदास, भिक्षु अंगुलिमाल, गणिका एवं अजामिल...View More
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पैसे से भी अधिक महत्त्वपूर्ण संपत्ति है- समय। खोया हुआ पैसा फिर पाया जा सकता है, पर खोया हुआ समय फिर कभी लौटकर नहीं आता। जो क्षण एक बार गये वे सदा के लिए गए। धन मनुष्यकृत और समय ईश्वर प्रदत्त सम्पत्ति...View More
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अहिंसा एक आदर्श एवं दृष्टिकोण है, जिसमें दूसरों के सम्मान तथा अधिकार को अक्षुण्ण रहने देने की दृढ़ता, आत्मीयता, सहनशीलता, करुणा एवं उदारता का समावेश है। अपने कष्ट की ही तरह यदि दूसरों के कष्ट को भी माना जाय, अपनी क्षति की तरह...View More
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प्यार आध्यात्मिक गुण है। उसकी सार्थकता तभी है, जब उसके साथ उत्कृष्टतावादी आदर्शों में समन्वय रह सके। ऐसा प्यार ही प्रयोक्ता और उपभोक्ता के लिए समान रूप से श्रेयस्कर होता है। सच्चे प्यार में एक आँख दुलार की और एक आँख सुधार...View More
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सत्य ही सब तरह से हमारे लिए उपासनीय है। सत्य के मार्ग पर प्रारंभ में कुछ कठिनाइयाँ आ सकती हैं, किन्तु यह जीवन को उत्कृष्ट और महान् बनाने का राजमार्ग है। जिस तरह आग में तपाकर, कसौटी पर घिसकर सोने की परख...View More
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स्मरण रहे, सहज मौन ही हमारे ज्ञान की कसौटी है। ‘जानने वाला बोलता नहीं और बोलने वाला जानता नहीं’- इस कहावत के अनुसार जब हम सूक्ष्म रहस्यों को जान लेते हैं तो हमारी वाणी बंद हो जाती है। ज्ञान की सर्वोच्च...View More
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कोई नियम, निर्देश, प्रतिबन्ध या कानून मनुष्य को सदाचारी बनने के लिए विवश नहीं कर सकते। वह अपनी चतुरता से हर प्रतिबन्ध का उल्लंघन करने की तरकीब निकाल सकता है, पर यदि आत्मिक अंकुश लगा रहेगा तो बाह्य जीवन में अनेक कठिनाइयाँ...View More
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मनुष्य और भय परस्पर विरोधी शब्द हैं। मनुष्य में जिस शक्ति की कल्पना की जाती है उसके रहते उसे भय कदापि न होना चाहिए, पर आत्मबल की कमी और अपनी शक्तियों पर विश्वास न रखने से ही वह स्थिति बनती है। भय...View More
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पुरुषार्थ एक नियम है और भाग्य उसका अपवाद। अपवादों का अस्तित्व तो मानना पड़ता है, पर उनके आधार पर कोई नीति नहीं अपनाई जा सकती। जैसे कभी- कभी ग्रीष्म ऋतु में ओले बरस जाते हैं, यह अपवाद है। इन्हें कौतुक या कौतूहल की...View More
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जो यह चाहते हैं कि कोई हमारी सहायता करे, हमें जीवन पथ पर चलने की दिशा दिखावे, वे अंधकार में ही निवास करते हैं। ऐसी स्थिति से समाज में दासवृत्ति को जीवन और पोषण मिलता है, क्योंकि तब हम दूसरों का...View More
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दूसरे व्यक्ति हमारे अनुकूल ही अपना स्वभाव बदल लें और जैसे हम चाहते हैं वैसे ही चलें यह सोचने की अपेक्षा यह सोचना अधिक युक्तिसंगत है कि इस बहुरंगी दुनिया से मिल- जुल कर चलने और जैसा कुछ यहाँ है उसी...View More
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यदि आप जीवन में आई विरोधी परिस्थितियों से हार बैठे हैं, अपनी भावनाओं के प्रतिकूल घटनाओं से ठोकर खा चुके हैं और फिर जीवन की उज्ज्वल संभावनाओं से निराश हो बैठे हैं तो उद्धार का एक ही मार्ग है- उठिए और...View More
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