Chintan Quotes


दुनिया किसी को तब बड़ा मानती है, जब वह औसत दर्जे के आदमी से अधिक ऊँचा सिद्ध होता है। जिसका सोचने का तरीका उच्च आदर्शों पर अवलम्बित है, जो किसी मार्ग पर पैर बढ़ाने से पहले सौ बार यह सोचता है कि...View More
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सारे संसार को अपनी इच्छानुकूल बना लेना कठिन है, क्योंकि यह परमात्मा का बनाया हुआ है और अपनी इस कृति को वही बदल सकता है, पर अपनी निज की दुनिया को अपने अनुकूल बदल सकना हममें से हर एक के लिए...View More
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दूसरे को बदनीयत मान बैठना, उसके हर कार्य में द्वेष- दुर्भाव की गंध सूँघना अपनी तुच्छता का प्रतीक है। सद्भावना से भी कोई व्यक्ति अपने से असहमत हो सकता है और अपनी आशाओं के प्रतिकूल उत्तर दे सकता है। इतने मात्र से...View More
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प्रसन्न रह सकना इस संसार का बहुत बड़ा सुख है। हर कोई प्रसन्नता चाहता है, आनंद की खोज में है और विनोद तथा उल्लासमयी परिस्थितियों को ढूँढता है। यह आकाँक्षा निश्चय ही पूर्ण हो सकती है यदि हम बुराइयों की...View More
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मनुष्य दूसरों को मात्र नैतिक उपदेश ही देता रहे तो उससे किसी का काम नहीं बनता। समय पर सहायता मिलना, मुश्किलें और कठिनाइयाँ दूर करना, उपदेश देने की अपेक्षा अधिक उपयोगी है। इसी से किसी को कुछ ठोस लाभ प्राप्त हो सकता...View More
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हम जो सफलता चाहते हैं, जिसके लिए प्रयत्नशील हैं, वह कामना कब तक पूरी हो जावेगी, इसका उत्तर सोचने से पूर्व अन्य परिस्थितियों को भुलाया नहीं जा सकता। अपना स्वभाव, सूझबूझ, श्रमशीलता, योग्यता, दूसरों का सहयोग, सामयिक परिस्थितियाँ, साधनों का अच्छा- बुरा होना, सिर पर लदे...View More
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जीवन में हर घड़ी आनंद और संतोष की मंगलमय अनुभूतियाँ उपलब्ध करते रहना अथवा द्वेष, विक्षेप और असंतोष की नारकीय अग्नि में जलते रहना बिलकुल अपने निज के हाथ की बात है। इसमें न कोई दूसरा बाधक है और न सहायक। अपना...View More
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मानवीय गरिमा


यदि हम सज्जनता ढूँढने निकलें तो सर्वत्र न्यूनाधिक मात्रा में सज्जनता दिखाई देगी। मानवता के श्रेष्ठ गुणों से रहित कोई भी व्यक्ति इस संसार में नहीं है। सद्गुण और अच्छाइयाँ ढूँढने निकलें तो बुरे समझे जाने वाले मनुष्यों में भी...View More
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प्रेरक विचार


यदि हम सज्जनता ढूँढने निकलें तो सर्वत्र न्यूनाधिक मात्रा में सज्जनता दिखाई देगी। मानवता के श्रेष्ठ गुणों से रहित कोई भी व्यक्ति इस संसार में नहीं है। सद्गुण और अच्छाइयाँ ढूँढने निकलें तो बुरे समझे जाने वाले मनुष्यों में भी...View More
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भाव संवेदना


इस संसार में भावना ही प्रधान है। कर्म का भला- बुरा रूप उसी के आधार पर बंधनकारक और मुक्तिदायक बनता है। सद्भावना से प्रेरित कर्म सदा शुभ और श्रेष्ठ ही होते हैं, पर कदाचित् वे अनुपयुक्त भी बन पड़ें तो भी लोक...View More
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भाव संवेदना


जिन्दगी को ठीक तरह जीने के लिए एक ऐसे साथी की आवश्यकता रहती है जो पूरे रास्ते हमारे साथ रहे, रास्ता बतावे, प्यार करे, सलाह दे और सहायता की शक्ति तथा भावना दोनों से ही संपन्न हो। ऐसा साथी मिल जाने पर...View More
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कर्मफल और ईश्वर


जिन्दगी को ठीक तरह जीने के लिए एक ऐसे साथी की आवश्यकता रहती है जो पूरे रास्ते हमारे साथ रहे, रास्ता बतावे, प्यार करे, सलाह दे और सहायता की शक्ति तथा भावना दोनों से ही संपन्न हो। ऐसा साथी मिल जाने पर...View More
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प्रेरक विचार


पूर्णतः पाक साफ, दूध का धुला हुआ कोई नहीं होता। भूलें, बुराइयाँ, पाप हो जाना मनुष्य की स्वाभाविक कमजोरी है। प्रत्येक मनुष्य पैदा होने से मरने तक कोई न कोई बुरा काम कर ही बैठता है। गिरकर उठने में, बुराई से भलाई की ओर...View More
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समाज निर्माण


विवाहों को मँहगा बनाना अपनी बच्चियों के जीवन विकास पर कुठाराघात करना है। जिन्हें अपनी या दूसरों की बच्चियों के प्रति मोह- ममता न हो, जिन्हें इस दो दिन की धूमधाम की तुलना में नारी जाति की बर्बादी उपेक्षणीय लगती हो, वे...View More
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मानवीय गरिमा


जो बदले की नीयत से सत्कर्म कर रहा है, वह व्यापारी है। पुण्य और परमार्थ को वाहवाही के लिए बेच देने वाले व्यापारी हीरा बेंचकर काँच खरीदने वाले मूर्ख की तरह हैं। जिसने प्रशंसा प्राप्त कर ली उसे पुण्य फल नाम...View More
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कर्मफल और ईश्वर


जो बदले की नीयत से सत्कर्म कर रहा है, वह व्यापारी है। पुण्य और परमार्थ को वाहवाही के लिए बेच देने वाले व्यापारी हीरा बेंचकर काँच खरीदने वाले मूर्ख की तरह हैं। जिसने प्रशंसा प्राप्त कर ली उसे पुण्य फल नाम...View More
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प्रेरक विचार


हमें मूक सेवा को महत्त्व देना चाहिए। नींव के अज्ञात पत्थरों की छाती पर ही विशाल इमारतें तैयार होती हैं। इतिहास के पन्नों पर लाखों परमार्थियों में से किसी एक का नाम संयोगवश आ पाता है। यदि सभी स्वजनों का नाम...View More
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समाज निर्माण


जिस तरह साधनों की पवित्रता आवश्यक है, उसी तरह साध्य की उत्कृष्टता भी आवश्यक है। साध्य निकृष्ट हो और उसमें अच्छे साधनों को भी लगा दिया जाये तो कोई हितकर परिणाम प्राप्त नहीं होगा। उलटे उससे व्यक्ति और समाज की हानि ही...View More
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सफल सार्थक जीवन


जो प्राप्त है, उसमें प्रसन्नता अनुभव करते हुए अधिक के लिए प्रयत्नशील रहना बुद्धिमानी की बात है, पर यह पहले सिरे की मूर्खता है कि अपनी कल्पना के अनुरूप सब कुछ न मिल पाने पर मनुष्य खिन्न और असंतुष्ट ही...View More
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प्रेरक विचार


असत्य से किसी स्थायी लाभ की प्राप्ति नहीं होती। यह तो धोखे का सौदा है, लेकिन खेद का विषय है कि लोग फिर भी असत्य का अवलम्बन लेते हैं। एक दो बार भले ही असत्य से कुछ भौतिक लाभ प्राप्त कर...View More
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सुव्यवस्थित पारिवारिक संबंध


घरेलू और सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि क्रोध के विनाशक परिणामों पर ध्यान दें और उनके उन्मूलन का संपूर्ण शक्ति से प्रयत्न करें। इससे सदैव हानि ही होती है। प्रायः देखा गया है कि...View More
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समाज निर्माण


घरेलू और सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि क्रोध के विनाशक परिणामों पर ध्यान दें और उनके उन्मूलन का संपूर्ण शक्ति से प्रयत्न करें। इससे सदैव हानि ही होती है। प्रायः देखा गया है कि...View More
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समाज निर्माण


शुद्ध व्यवहार और सदाचार समाज की सुदृढ़ स्थिति के दो आधार स्तम्भ हैं। इनसे व्यक्ति का भाग्य और समाज का भविष्य विकसित होता है। शिक्षा, धन एवं भौतिक समुन्नति का सुख भी इसी बात पर निर्भर है कि लोग सद्गुणी और...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


अभी तक किसी महापुरुष के जीवन से ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिला, जहाँ घृणा, द्वेष, परदोष दर्शन तथा प्रतिशोध के द्वारा किसी मंगल कार्य की सिद्धि हुई हो। प्रतिशोध से मनुष्य की बुद्धि नष्ट होती है। विवेक चला जाता है। जीवन...View More
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प्रेरक विचार


दूसरों की आँखों में धूल डालकर स्वयं बुरे होते हुए भी अच्छाई की छाप डाल देना चतुरता का चिह्न माना जाता है और आजकल लोग करते भी ऐसा ही हैं। झूठी और नकली बातें अफवाहों के रूप में इस तरह...View More
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कर्मफल और ईश्वर


बुराई मनुष्य के बुरे कर्मों की नहीं, वरन् बुरे विचारों की देन होती है। इसलिए वह एक बार में ही समाप्त नहीं हो जाती, वरन् स्वभाव और संस्कार का अंग बन जाती है। ऐसी स्थिति में बुराई भी भलाई जान पड़ने लगती...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


प्रशंसा का सबसे बड़ा कदम यह है कि आदमी अपनी समीक्षा करना सीखे, अपनी गलतियों को समझे- स्वीकार करे और अगला कदम यह उठाये कि अपने को सुधारने के लिए अपनी बुरी आदतों से लड़े और उन्हें हटाकर रहे। जिसने इतनी हिम्मत...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


आखिर हम स्वयं क्या हैं और अपनी आँखें अपने को किस नजर से देखती हैं? आत्मा की अदालत में इन्साफ की तराजू पर तोले जाय तो हमारा पलड़ा बुराई की ओर झुकता है या भलाई की ओर। यदि हम अपनी...View More
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स्वाध्याय और सदविचार


प्रेरक स्वाध्याय वस्तुतः एक प्रकार की ईश्वर उपासना ही है। यों रूढ़िवादी लकीर पीटकर कूड़े करकट जैसी किन्हीं बूढ़ी, पुरानी, किस्से- कहानियों की किताबों को घोटते रहना भी आज स्वाध्याय के नाम से पुकारा जाता है, पर वास्तविक स्वाध्याय वह है जिसकी...View More
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सफल सार्थक जीवन


हमें अपने बारे में अपनी राय आप निर्धारित करनी चाहिए और उसी को सही तथा वजनदार मानना चाहिए। यदि हम अच्छे हैं और सही राह पर चल रहे हैं तो फिर कोई कारण नहीं कि किसी अजनबी या दूरवर्ती की नासमझी...View More
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