समय रूपी अमूल्य उपहार का एक क्षण भी आलस्य और प्रमाद में नष्ट न करें।


By Pandit Shriram Sharma Acharya
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उपासना की निष्ठा को जीवन में हमने उसी तरीके से घोलकर रखा है जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के प्रति निष्ठावान रहती है और कहती है- ‘सपनेहु आन पुरुष जग नाही।’ आपके पूजा की चौकी पर तो कितने बैठे हुए हैं। ऐसी निष्ठा होती है कोई? एक से श्रद्धा नहीं बनेगी क्या? मित्रो! हमारे भीतर श्रद्धा है। हमने एक पल्ला पकड़ लिया है और सारे जीवन भर उसी का पल्ला पकड़े रहेंगे। हमारा प्रियतम कितना अच्छा है। उससे अधिक रूपवान, सौंदर्यवान, दयालु और संपत्तिवान और कोई हो नहीं सकता। हमारा वही सब कुछ है, वही हमारा भगवान् है।


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अपनी स्वयं की स्वच्छता, अपने जीवन में सादगी तथा घर की सफाई, मरम्मत, सादगीपूर्ण सज्जा और सुव्यवस्था पर ध्यान रखना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।


By Pandit Shriram Sharma Acharya
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खुशामद बड़े- बड़ों को ले डूबती है।


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निरक्षरता मनुष्य जीवन का बहुत बड़ा कलंक है।


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He alone lives a worthwhile life, who has a cool head, warm blood, a loving heart, and zest for life.


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The greatest obstacle in the path of spiritual development is man's egoistic thought. It is possible for man to save himself from this evil condition by keeping in mind the transience of the world.


By Pandit Shriram Sharma Acharya
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अच्छे काम का प्रयोग अपने से ही आरम्भ करो।


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ज्ञान की परिपक्वता कर्म से होती है।


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भाग्यवाद हमें नपुंसक और निर्जीव बनाता है।


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स्वच्छता सभ्यता का प्रथम सोपान है।

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अवसर की प्रतीक्षा में मत बैठो। आज का अवसर ही सर्वोत्तम है।


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