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एकला चलो रे
हम अकेले चलें। सूर्य- चन्द्र की तरह अकेले चलने में हमें तनिक भी संकोच न हों। अपनी आस्थाओं को दूसरों के कहे- सुने अनुसार नहीं, वरन् अपने स्वतंत्र चिंतन के आधार पर विकसित करें। अंधी भेड़ों की तरह झुण्ड का अनुगमन करने की मनोवृत्ति छोड़ें। सिंह की तरह अपना मार्ग अपनी विवेक चेतना के आधार पर स्वयं निर्धारित करें। सहीं को अपनाने और गलत को छोड़ देने का साहस ही हमारे युग- निर्माण परिवार के परिजनों की वह पूंजी है, जिसके आधार पर हम युग साधना की वेला में ईश्वरीय प्रदत्त उत्तरदायित्व का सहीं रीति से निर्वाह कर सकेंगे


Pandit Shriram Sharma Acharya
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Murari
2015-07-07 09:04:18
Very true. We must remember and follow.This provides strength and closrness with Guru and God.