Share on Google+ Email
प्रेम गंगा की भांति वह पवित्र जल है, जिसे जहाँ−कहीं छिड़का जाय, वहीं पवित्रता पैदा करेगा। उसमें आदर्शों की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है। आदर्शरहित प्यार को ही मोह कहते हैं। दूरदर्शिता, विवेकशीलता, शालीनता, पवित्रता, सदाशयता जैसे गुणों का भरपूर समावेश प्रेम में होता है। उसमें इन्हीं गुणों की अभिवृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहता है। मोह इन विशेषताओं से रहित होता है।


Pandit Shriram Sharma Acharya
Comments

Post your comment