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गृहस्थ धर्म में मनुष्य अपनी दिन- दिन की खुदगर्जी के ऊपर अंकुश लगाता जाता है, आत्म संयम सीखता और स्त्री- पुरुष, संबंधी, परिजन आदि में अपनी आत्मीयता बढ़ाता जाता है। यही उन्नति धीरे- धीरे आगे बढ़ती जाती है और मनुष्य संपूर्ण चर- अचर में जड़- चेतन में आत्म सत्ता को ही समाया देखता है। उसे परमात्मा की दिव्य ज्योति जगमगाती दीखती है।


Pandit Shriram Sharma Acharya
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