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    आत्मीय परिजनों !
    समय का प्रवाह वैज्ञानिक प्रगति के साथ प्रत्यक्षवाद का समर्थक होता जा रहा है। सच तो यह है कि जो लोग धर्म और अध्यात्म को चर्चा- प्रसंगों में मान्यता देते हैं, वे भी निजी जीवन में प्राय: वैसा ही आचरण करते देखे जाते है जैसे कि अधर्मी और नास्तिक करते देखे जाते हैं। धर्मोंपदेशक से लेकर धर्मध्वजियों के निजी जीवन का निरीक्षण- परीक्षण करने पर प्रतीत होता है कि अधिकांश लोग उस स्वार्थपरता को ही अपनाये रहते हैं जो अधार्मिकता की परिधि में आती है। आडम्बर, पाखण्ड और प्रपंच एक प्रकार से प्रच्छन्न नास्तिकता ही है, अन्यथा जो आस्तिकता और धार्मिकता की महत्ता भी बखानते हैं, उन्हें स्वयं भी भीतर और बाहर से एक रस होना ही चाहिए था। जब उनकी स्थिति आडम्बर भरी होती दीखती है, तो प्रतीत होता है कि प्रत्यक्षवादी नास्तिकता ही नहीं, प्रच्छन्न धर्माडम्बर भी लगभग उसी मान्यता को अपनाये हुए हैं। लोगों की आँखों में धूल झोंकने या उनसे अनुचित लाभ उठाने के लिए ही धर्म का ढकोसला गले से बाँधा जा रहा है। ईश्वर को भी वे न्यायकारी- सर्वव्यापी नहीं मानते ।। यदि ऐसा होता तो धार्मिकता की वकालत करने वालों में से कोई भी परोक्ष रूप से अवांछनीयता अपनाये रहने के लिए तैयार नहीं होता। तथाकथित धार्मिक और खुलकर इंकार करने वाले नास्तिक लगभग एक ही स्तर के बन जाते हैं।              
     - परिवर्तन के महान् क्षण (अन्तिम पुस्तक) पृष्ठ- ६ !
     

    जिस प्रकार ईश्वर की महान् कृतियों को देखकर ही उसकी गरिमा का अनुमान लगाया जाता है, उसी प्रकार हमारा कर्तव्य पोला था या ठोस, यह अनुमान उन लोगों की परख करके लगाया जायेगा, जो हमारे श्रद्धालु एवं अनुयायी कहे जाते हैं। यदि वाचालता भर के प्रशंसक और दण्डवत प्रणाम भर के श्रद्धालु रहे तो माना जायेगा कि सब कुछ पोला रहा। असलियत कर्म में सन्निहित है। वास्तविकता की परख क्रिया से होती है।....यदि अपने गायत्री परिवार की क्रिया- पद्धति का स्तर दूसरे अन्य नर- पशुओं जैसा ही बना रहा, तो हमें स्वयं अपने श्रम और विश्वास की निरर्थकता पर कष्ट होगा और लोगों की दृष्टि में उपहासास्पद बनना पड़ेगा। 
     -शांतिकुंज
    प्रज्ञा १० सद्वाक्यपट !
     
    दूसरों को कैसा बनाया जाना चाहिए, इसके लिए एक मण्डल विनिर्मित करना होगा। उपकरण ढालने के लिए तदनुरूप साँचा बनाए बिना काम नहीं चलता। लोग कैसे बनें? कैसे बदलें? इस प्रयोग को सर्वप्रथम अपने ऊपर ही किया जाना चाहिए और बताया जाना चाहिए कि कार्य उतना कठिन नहीं है, जितना कि समझा जाता है। हाथ- पैरों की हरकतें इच्छानुसार मोड़ी- बदली जा सकती हैं, तो कोई कारण नहीं कि अपनी निज की प्रखरता को सद्गुणों से सुसज्जित करके चमकाया- दमकाया न जा सके। 
    -जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र पृष्ठ १४ !
     


    Pandit Shriram Sharma Acharya
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