👉 असली पारसमणी

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एक व्यक्ति एक संत के पास आया व उनसे याचना करने लगा कि वह निर्धन है। वे उसे कुछ धन आदि दे दें, ताकि वह जीविका चला सके। संत ने कहा–– हमारे पास तो वस्त्र के नाम पर यह लँगोटी व उत्तरीय है। लँगोटी तो आवश्यक है, पर उत्तरीय तुम ले जा सकते हो। इसके अलावा ओर कोई ऐसी निधि हमारे पास है नहीं। वह व्यक्ति बराबर गिड़गिड़ता ही रहा, तो वे बोले–– अच्छा, झोंपड़ी के पीछे एक पत्थर पड़ा होगा। कहते हैं, उससे लोहे को छूकर सोना बनाया जा सकता है। तुम उसे ले जाओ। प्रसन्नचित्त वह व्यक्ति भागा व उसे लेकर आया। खुशी से चिल्ला पड़ा–– महात्मन्ǃ यह तो पारसमणि है। आपने यह ऐसे ही फेंक दी।

संत बोले––हाँ बेटाǃ मैं जानता हूँ और यह भी कि यह नरक की खान भी है। मेरे पास प्रभुकृपा से आत्मसंतोष रूपी धन है, जो मुझे निरंतन आत्मज्ञान और अधिक ज्ञान प्राप्त करने को प्रेरित करता है। मेरे लिए इस क्षणिक उपयोग की वस्तु का क्या मूल्यॽ वह व्यक्ति एकटक देखता रह गया।

फेंक दी उसने भी पारसमणि। बोला–– भगवन्ǃ जो आत्मसंतोष आपको है व जो कृपा आप पर बरसी है। उससे मैं इस पत्थर के कारण वंचित नहीं होना चाहता। आप मुझे भी उस दिशा में बढ़ने की प्रेरणा दें, जो सीधे प्रभुप्राप्ति की ओर ले जाती है। संत ने उसे शिष्य के रूप में स्वीकार किया। वे दोनों मोक्षसुख पा गये।

विवेकवान् के समक्ष हर वैभव, हर संपदा तुच्छ है। वह सतत अपने चरमलक्ष्‍य परमपद की प्राप्ति की ओर बढ़ता रहता है।

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