धर्म और विज्ञान

ईश्वर

ईश्वर सर्वत्र है, इसका यह गलत अर्थ नहीं लगा लेना चाहिए कि जहाँ जो कुछ भी हो रहा है ईश्वर की इच्छा से हो रहा है। बुराइयाँ, बुरे काम, ईश्वर की इच्छा से कदापि नहीं होते। पाप कर्म तो मनुष्य अपनी स्वतंत्र कर्तृत्व शक्ति का दुरुपयोग करके करते हैं। इस दुरुपयोग का नाम ही शैतान है। शैतान की सत्ता को हटाकर ईश्वरीय सत्ता को प्रकाश में लाना यह मनुष्य मात्र का धर्म है।

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युग निर्माण योजना


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सफल सार्थक जीवन


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आध्यात्मिक चिंतन धारा


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सफल सार्थक जीवन


स्वार्थपरता का अनिवार्य परिणाम असंतोष और निराशा है, क्योंकि इच्छाओं का कोई अंत नहीं है। इसलिए सुख की समस्या का एकमात्र उपाय इच्छा- त्याग है। बाहरी दमन के द्वारा इच्छाओं पर पूर्ण...View More
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लोग बुराई और भलाई के बारे में अपने अलग- अलग दृष्टिकोण बनाते हैं और चाहते हैं कि सभी लोग उस ढंग पर चलें। एक दूसरे में दोष देखने का यही कारण...View More
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सफल सार्थक जीवन


इस संसार में हर प्रकार के अवसर मौजूद हैं। यहाँ पैरों में चुभने वाले काँटे भी बहुत हैं और सुगन्ध- सुशमा से भरे- पूरे फूलों की भी कमी नहीं। यह निर्धारण करने...View More
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समाज निर्माण


शुद्ध व्यवहार और सदाचार समाज की सुदृढ़ स्थिति के दो आधार स्तम्भ हैं। इनसे व्यक्ति का भाग्य और समाज का भविष्य विकसित होता है। शिक्षा, धन एवं भौतिक समुन्नति का सुख...View More
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भाव संवेदना


इस संसार में भावना ही प्रधान है। कर्म का भला- बुरा रूप उसी के आधार पर बंधनकारक और मुक्तिदायक बनता है। सद्भावना से प्रेरित कर्म सदा शुभ और श्रेष्ठ ही होते...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


प्रशंसा का सबसे बड़ा कदम यह है कि आदमी अपनी समीक्षा करना सीखे, अपनी गलतियों को समझे- स्वीकार करे और अगला कदम यह उठाये कि अपने को सुधारने के लिए अपनी...View More
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समाज निर्माण


नारियाँ गुण- सौन्दर्य बढ़ायें, आभूषण नहीं। आभूषणों से सौन्दर्य बढ़ता हो सम्मान मिलता हो ,ऐसी कोई बात तो समझ में आती नहीं, उलटे शरीर के अंग दुखते है। चोरों का...View More
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कर्मफल और ईश्वर


यदि आप किन्हीं कठिनाइयों में है, तो इसका कारण ईश्वर नहीं है, वरन् आपके ही कुछ दोष हैं, जिन्हें आप भले ही जानते हों या न जानते हों। पाप एवं दुष्कर्म...View More
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प्रेरक विचार


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भाव संवेदना


आश्वासन एवं अनुरोध :-
यह निश्चित है कि शरीर के बिना भी बहुत कुछ करते बन पड़ेगा।.................जीवित रहने की अपेक्षा शरीर के न रहने पर समर्थता एवं सक्रियता और...View More
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स्वाध्याय और सदविचार


सुख- दुःख, हर तरह की परिस्थिति में संतुष्ट रहने को संतोष कहते है। कुसंस्कारों के परिशोधन एवं सुसंस्कारों के अभिवर्धन के लिए स्वेच्छापूर्वक जो कष्ट उठाया जाता है- वह तप कहलाता है।...View More
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प्रेम गंगा की भांति वह पवित्र जल है, जिसे जहाँ−कहीं छिड़का जाय, वहीं पवित्रता पैदा करेगा। उसमें आदर्शों की अविच्छिन्नता जुड़ी रहती है। आदर्शरहित प्यार को ही मोह कहते हैं। दूरदर्शिता, विवेकशीलता,...View More
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संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जिसकी प्राप्ति मनुष्य के लिए असम्भव हो। प्रयत्न और पुरुषार्थ से सब कुछ पाया जा सकता है, लेकिन एक ऐसी भी चीज है, जिसे एक...View More
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आध्यात्मिक चिंतन धारा


सोचो तुम क्या हो?
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उम्मीदों को आघात न पहुँचाए :-
कुसंस्कारी परिजन नरक में रहने वाले यमदूतों से भी अधिक दुःख देते है। इसका अनुभव उन्हें भली- भांति होगा, जिन्हें स्त्री, पति, पुत्र, पुत्री,...View More
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अनुदान की कीमत चुकाएँ :-
युग की पुकार पर कोई आया। अंधेरी तमिस्रा में तिल- तिल करके दीपक की तरह जला। जितना सम्भव था प्रकाश फैलाया, पर तेल और बाती की...View More
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भाव संवेदना


कुछ भी नहीं असम्भव होता
तू सूर्य और चन्द्रमा को अपने पास नहीं उतार सका, इसका कारण उनकी दूरी नहीं, वरन् तेरी दूरी की भावना है। तू संसार को बदल...View More
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प्रेरक विचार


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गलती से सीखें :-
गलती करना बुरा नहीं है, बल्कि गलती को न सुधारना बुरा है। संसार के महान् पुरुषों ने भी अनेक तरह की गलतियाँ की है। रावण जैसा...View More
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भाव संवेदना


गुरुवाणी :-
लोग कहें कि तुम्हारे गुरु से बड़ा कोई ज्ञानी है, तो मान लेना। यदि कोई कहे कि तुम्हारे गुरु से बड़ा कोई दूसरा तपस्वी और सिद्ध- समर्थ है...View More
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सफल सार्थक जीवन


सद्गुरु के स्वर:-
मेरे विचारों में, मेरे साहित्य में मेरी इच्छाओं को ढूंढो। उन शिक्षाओं का अनुसरण करो जो मेरे गुरु ने मुझे दी थी और जिसे मैने तुम्हें...View More
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