आत्मचिंतन के क्षण

आत्मचिंतन के क्षण 16 Dec 2018

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ऐसा कोई नियम नहीं है कि आप सफलता की आशा रखे बिना, अभिलाषा किये बिना, उसके लिए दृढ़ प्रयत्न किये बिना ही सफलता प्राप्त कर सको। प्रत्येक ऊँची सफलता के लिए पहले मजबूत, दृढ़, आत्म श्रद्धा का होना अनिवार्य है। इसके बिना सफलता कभी मिल नहीं सकती। भगवान् के इस नियमबद्ध और श्रेष्ठ व्यवस्थायुक्त जगत् में देवयोग के लिए कोई स्थान नहीं है। ऐसा विचार मत करो कि उसका भाग्य उसे जहाँ-तहाँ भटका रहा है और इस रहस्यमय भाग्य के सामने उसका क्या बस चल सकता है। उसको मन से निकाल देने का प्रयत्न करना चाहिए। किसी तरह के भाग्य से मनुष्य बड़ा है और बाहर की किसी भी शक्ति की अपेक्षा प्रचण्ड शक्ति उसके भीतर मौजूद है, इस बात को जब तक वह नहीं समझ लेगा, तब तक उसका कदापित कल्याण नहीं हो सकता। दूसरों को सुधारने से पहले हमें अपने सुधार की बात सोचनी चाहिए। दूसरों की दुर्बलता के प्रति एकदम आगबबूला हो उठने से पहले हमें यह भी देखना उचित है कि अपने भीतर कितने दोष-दुर्गुण भरे पड़े हैं। बुराइयों सको दूर करना एक प्रशंसनीय प्रवृत्ति है। अच्छे काम का प्रयोग अपने से ही आरंभ करना चाहिए। हम सुधरें-हमारा दृष्टिकोण सुधरे तो दूसरों का सुधार होना कुछ भी कठिन नहीं।