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मैं क्या हूँ ? What Am I ? (भाग 1)

मैं क्या हूँ-1

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भूमिका

इस संसार मे जानने योग्य अनेक बातें हैं। विद्या के अनेकों क्षेत्र हैं, खोज के लिए, जानकारी प्राप्त करने के लिए अमित मार्ग हैं। अनेकों विज्ञान ऐसे हैं जिनकी बहुत कुछ जानकारी प्राप्त करना मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति है। क्यों? कैसे? कहाँ? कब? के प्रश्न हर क्षेत्र में वह...View More

आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण (भाग 4)

आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण-4

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एक सज्जन, शालीन, सम्भ्रान्त, सुसंस्कृत नागरिक का स्वरूप क्या होना चाहिए? उसके गुण, कर्म, स्वभाव में किन शालीनताओं का समावेश होना चाहिए। इसका एक ढाँचा सर्वप्रथम अपने मस्तिष्क में खड़ा किया जाय। मानवी मर्यादा और स्थिति क्या होगी? इसका स्वरूप निर्धारण कुछ कठिन नहीं है। दिनचर्या की दृष्टि से सुव्यवस्थित,...View More

आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण (भाग 3)

आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण-3

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इन दोनों को आत्म-साधना का अविच्छिन्न अंग माना गया है। प्रातः काल उठते समय अथवा अन्य किसी निश्चिंत, शान्त, एकान्त स्थिति में न्यूनतम आधा घण्टे का समय इस प्रयोजन के लिए निकाला जाना चाहिए। मनन को प्रथम और चिंतन को द्वितीय चरण माना जाना चाहिए। दर्जी पहले कपड़ा काटता है,...View More

आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण (भाग 2)

आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण-5

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रोटी, साग, चावल, दाल का आहार मिला-जुला कर करते हैं। ऐसा नहीं होता कि कुछ समय दाल ही पीते रहे-कुछ शाक खाकर रहे, फिर चावल खाया करे और बहुत दिन बाद केवल रोटी पर ही निर्भर रहे। स्कूली पढ़ाई में भाषा, गणित, भूगोल, इतिहास की पढ़ाई साथ चलती है, ऐसा...View More

आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण (भाग 1)

आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण-1

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आगे बढ़ने का क्रम यह है कि एक कदम पीछे से उठा कर आगे रखा जाय और जो आगे रखा था उसे और आगे बढ़ाया जाय। इसी प्रकार चलने की क्रिया संपन्न होती है और लम्बी मंजिल पार की जाती है। आत्मिक प्रगति का मार्ग भी यही है। पिछड़ी योनियों...View More

आत्मचिंतन के क्षण 17 Dec 2018

आत्मचिंतन के क्षण-1

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सुख-दुःख हमारे अपने ही पैदा किए हुए, हमारी अपनी ही मनोभूमि के परिणाम हैं। हम अपनी मनोभूमि परिष्कृत करें, विचारों को उत्कृष्ट और रचनात्मक बनायें, भावनाएँ शुद्ध करें, इसी शर्त पर जीवन हमें सुख, शान्ति, प्रसन्नता, आनंद प्रदान करेगा, अन्यथा वह सदा असंतुष्ट और रूठा ही बैठा रहेगा और अपने...View More

आत्मचिंतन के क्षण 17 Dec 2018

आज का सद्चिंतन-1

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सुख-दुःख हमारे अपने ही पैदा किए हुए, हमारी अपनी ही मनोभूमि के परिणाम हैं। हम अपनी मनोभूमि परिष्कृत करें, विचारों को उत्कृष्ट और रचनात्मक बनायें, भावनाएँ शुद्ध करें, इसी शर्त पर जीवन हमें सुख, शान्ति, प्रसन्नता, आनंद प्रदान करेगा, अन्यथा वह सदा असंतुष्ट और रूठा ही बैठा रहेगा और अपने...View More

आत्मचिंतन के क्षण 17 Dec 2018

जीवन जीने की कला-1

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सुख-दुःख हमारे अपने ही पैदा किए हुए, हमारी अपनी ही मनोभूमि के परिणाम हैं। हम अपनी मनोभूमि परिष्कृत करें, विचारों को उत्कृष्ट और रचनात्मक बनायें, भावनाएँ शुद्ध करें, इसी शर्त पर जीवन हमें सुख, शान्ति, प्रसन्नता, आनंद प्रदान करेगा, अन्यथा वह सदा असंतुष्ट और रूठा ही बैठा रहेगा और अपने...View More

आत्मचिंतन के क्षण 16 Dec 2018

आत्मचिंतन के क्षण-1

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ऐसा कोई नियम नहीं है कि आप सफलता की आशा रखे बिना, अभिलाषा किये बिना, उसके लिए दृढ़ प्रयत्न किये बिना ही सफलता प्राप्त कर सको। प्रत्येक ऊँची सफलता के लिए पहले मजबूत, दृढ़, आत्म श्रद्धा का होना अनिवार्य है। इसके बिना सफलता कभी मिल नहीं सकती। भगवान् के इस...View More

आत्मचिंतन के क्षण 16 Dec 2018

आज का सद्चिंतन-1

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ऐसा कोई नियम नहीं है कि आप सफलता की आशा रखे बिना, अभिलाषा किये बिना, उसके लिए दृढ़ प्रयत्न किये बिना ही सफलता प्राप्त कर सको। प्रत्येक ऊँची सफलता के लिए पहले मजबूत, दृढ़, आत्म श्रद्धा का होना अनिवार्य है। इसके बिना सफलता कभी मिल नहीं सकती। भगवान् के इस...View More

आत्मचिंतन के क्षण 16 Dec 2018

जीवन जीने की कला-1

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ऐसा कोई नियम नहीं है कि आप सफलता की आशा रखे बिना, अभिलाषा किये बिना, उसके लिए दृढ़ प्रयत्न किये बिना ही सफलता प्राप्त कर सको। प्रत्येक ऊँची सफलता के लिए पहले मजबूत, दृढ़, आत्म श्रद्धा का होना अनिवार्य है। इसके बिना सफलता कभी मिल नहीं सकती। भगवान् के इस...View More

आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

आत्मचिंतन के क्षण-1

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प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं मानती। तब वह तमाम सवर्णों को छोड़कर रैदास और कबीर का वरण करती है, बलवानों, सुंदरों को छोड़कर गाँधी जैसे कमजोर शरीर और...View More

आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

आज का सद्चिंतन-1

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प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं मानती। तब वह तमाम सवर्णों को छोड़कर रैदास और कबीर का वरण करती है, बलवानों, सुंदरों को छोड़कर गाँधी जैसे कमजोर शरीर और...View More

आत्मचिंतन के क्षण 15 Dec 2018

जीवन जीने की कला-1

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प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती, वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है। वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं मानती। तब वह तमाम सवर्णों को छोड़कर रैदास और कबीर का वरण करती है, बलवानों, सुंदरों को छोड़कर गाँधी जैसे कमजोर शरीर और...View More